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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 32
नेतिप्रमाणेन निराकृताखिलो हृदा समास्वादितचिद्घनामृतः । त्यजेदशेषं जगदात्तसद्रसं पीत्वा यथाम्भः प्रजहाति तत्फलम् ॥
"नेति-नेति" आदि श्रुति-प्रमाण से निखिल संसार का बोध करके और हृदय में चिद्घनामृत का आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत्‌ को, उसके साररूप सत्‌ (ब्रह्म )-को ग्रहण करके त्याग दे, जैसे नारियल के जल को पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं।
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