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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 29
कोशेष्वयं तेषु तु तत्तदाकृति- र्विभाति सङ्गात्स्फतिकोपलो यथा । असङ्गरूपोऽयमजो यतोऽद्वयो विज्ञायतेऽस्मिन्परितो विचारिते ॥
स्फटिकमणि के समान यह आत्मा भी (अननमयादि) भिन्‍न-भिन्‍न कोशों में उनके संग से उन्हीं के आकार का भासने लगता है। किन्तु इसका भली प्रकार विचार करने से यह अद्वितीय होने के कारण असंगरूप और अजन्मा निश्चित होता है।
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