जब तक माया से मोहित रहने के कारण मनुष्य का शरीरादि में आत्मभाव है, तभी तक उसे वैदिक कर्मानुष्ठान कर्तव्य है। 'नेतिनेति' आदि वाक्यों से सम्पूर्ण अनात्मवस्तुओं का निषेध करके अपने परमात्मस्वरूप को जान लेने पर फिर उसे समस्त कर्मों को छोड़ देना चाहिये।
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