कदाचिदात्मा न मृतो न जायते
न क्षीयते नापि विवर्धतेऽनवः ।
निरस्तसर्वातिशयः सुखात्मकः
स्वयम्प्रभः सर्वगतोऽयमद्वयः ॥
आत्मा न कभी मरता है न जन्मता है; वह न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। वह पुरातन, सम्पूर्ण विशेषणों से रहित, सुखस्वरूप, स्वयंप्रकाश, सर्वगत और अद्वितीय है।
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