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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 38
अनाद्यविद्योद्भवबुद्धिबिम्बितो जीवप्रकाशोऽयमितीर्यते चितः । आत्माधियः साक्षितया पृथक्स्थितो बुध्द्यापरिच्छिन्नपरः स एव हि ॥
अनादि अविद्या से उत्पन्न हुई बुद्धि में प्रतबिम्बित यह चेतन का प्रकाश ही 'जीव' कहलाता है। बुद्धि के साक्षीरूप से आत्मा उससे पृथक्‌ है, वह परात्मा तो बुद्धि से अपरिच्छिन्न है।
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