यः सेवते मामगुणं गुणात्परं
हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम् ।
सोऽहं स्वपादाञ्चितरेणुभिः स्पृशन्
पुनाति लोकत्रितयं यथा रविः ॥
जो पुरुष अपने चित्त से मुझ गुणातीत निर्गुण का अथवा कभी-कभी मेरे सगुण स्वरूप का भी सेवन करता है, वह मेरा ही रूप है। वह अपनी चरण-रज के स्पर्श से सूर्य के समान सम्पूर्ण त्रिलोकी को पवित्र कर देता है।
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