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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 25
एकात्मकत्वाज्जहती न सम्भवे- त्तथाजहल्लक्षणता विरोधतः । सोऽयम्पदार्थाविव भागलक्षणा युज्येत तत्त्वम्पदयोरदोषतः ॥
इन "तत्‌" और "त्वम्‌" पदों में एकरूप होने के कारण जहतीलक्षणा नहीं हो सकती और परस्पर विरोध होने के कारण अजहल्लक्षणा भी नहीं हो सकती। इसलिये "सो5यम्‌" (यह वही है) इन दोनों पदों के अर्थ की भाँति इन "तत्‌" और "त्वम्‌" पदों में भी भागत्यागलक्षणा ही निर्दोषता से हो सकती है।
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