इच्छादिरागादि सुखादिधर्मिकाः
सदा धियः संसृतिहेतवः परे ।
यस्मात्प्रसुप्तौ तदभावतः परः
सुखस्वरूपेण विभाव्यते हि नः ॥
सबके साक्षी आत्मा में इच्छा, अनिच्छा, राग-द्वेष और सुखदुःखादिरूप बुद्धि की वृत्तियाँ ही जन्म-मरणरूप संसार की कारण हैं; क्योंकि सुषुप्ति में इनका अभाव हो जाने पर हमें आत्मा का सुखरूप से भान होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
श्रीरामगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
श्रीरामगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।