इन दोनों (जीवात्मा और परमात्मा) में जीवात्मा प्रत्यक् (अन्तःकरण का साक्षी) है और परमात्मा परोक्ष (इन्द्रियातीत) है, इस (वाच्यार्थरूप) विरोध को छोड़कर और लक्षणावृत्ति से लक्षित उनकी शुद्ध चेतनता को ग्रहणकर उसे ही अपना आत्मा जाने और इस प्रकार एकीभाव से स्थित हो।
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