न सत्यकार्योऽपि हि यद्वदध्वरः
प्रकाङ्क्षतेऽन्यानपि कारकादिकान् ।
तथैव विद्या विधितः प्रकाशितै-
र्विशिष्यते कर्मभिरेव मुक्तये ॥
क्योंकि जिस प्रकार (वेदोक्त) यज्ञ सत्य कर्म होने पर भी अन्य कारकादि की अपेक्षा करता ही है, उसी प्रकार विधि से प्रकाशित कर्मो के द्वारा ही ज्ञान मुक्ति का साधक हो सकता है। (अतः कर्मो का त्याग उचित नहीं है)
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