एवं सदाभ्यस्तसमाधियोगिनो
निवृत्तसर्वेन्द्रियगोचरस्य हि ।
विनिर्जिताशेषरिपोरहं सदा
दृश्यो भवेयं जितषड्गुणात्मनः ॥
इस प्रकार जो निरन्तर समाधियोग का अभ्यास करता है, जिसके सम्पूर्ण इन्द्रियगोचर विषय निवृत्त हो गये हैं तथा जिसने काम-क्रोधादि सम्पूर्ण शत्रुओं को परास्त कर दिया है, उस छठहों इन्द्रियों (मन और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों ) को जीतने वाले महात्मा को मेरा निरन्तर साक्षात्कार होता है।
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