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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 42
सदैव मुक्तोऽहमचिन्त्यशक्तिमा- नतीन्द्रियज्ञानमविक्रियात्मकः । अनन्तपारोऽहमहर्निशं बुधै- र्विभावितोऽहं हृदि वेदवादिभिः ॥
मैं सदा ही मुक्त, अचिन्त्यशक्ति, अतीन्द्रिय, ज्ञानस्वरूप, अविकृतरूप और अनन्त-पार हूँ। वेदवादी पण्डितजन अहर्निश मेरा हृदय में चिन्तन करते हैं।
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