सा तैत्तिरीयश्रुतिराह सादरं
न्यासं प्रशस्ताखिलकर्मणां स्फुटम् ।
एतावदित्याह च वाजिनां श्रुति-
र्ज्ञानं विमोक्षाय न कर्म साधनम् ॥
इसके सिवा तैत्तिरीय शाखा की प्रसिद्ध श्रुति भी आग्रहपूर्वक स्पष्ट कहती है कि समस्त कर्मों का त्याग करना ही अच्छा है तथा 'एतावत्' इत्यादि वाजसनेयी शाखा की श्रुति भी कहती है कि मोक्ष का साधन ज्ञान ही है कर्म नहीं।
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