एवं सदा जातपरात्मभावनः
स्वानन्दतुष्टः परिविस्मृताखिलः ।
आस्ते स नित्यात्मसुखप्रकाशकः
साक्षाद्विमुक्तोऽचलवारिसिन्धुवत् ॥
इस प्रकार निरन्तर परमात्मभावना करते-करते जो आत्मानन्द में मग्न हो गया है तथा जिसे सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच विस्मृत हो गया है, वह नित्य आत्मानन्द का अनुभव करने वाला जीवन्मुक्त योगी निस्तरंग समुद्र के समान साक्षात् मुक्तस्वरूप हो जाता है।
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