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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 48
विश्वं त्वकारं पुरुषं विलापये- दुकारमध्ये बहुधा व्यवस्थितम् । ततो मकारे प्रविलाप्य तैजसं द्वितीयवर्णं प्रणवस्य चान्तिमे ॥
नाना प्रकार से स्थित अकाररूप विश्व-पुरुष को उकार में लीन करे और ओंझकार के द्वितीय वर्ण तैजसरूप उकार को उसके अन्तिम वर्ण मकार में लीन करे।
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