इस प्रकार अहर्निश आत्मा का ही चिन्तन करता हुआ मुनि सर्वदा समस्त बन्धनों से मुक्त होकर रहे तथा (कर्ता-भोक्तापन के) अभिमान को छोड़कर प्रारब्धकल भोगता रहे। इससे वह अन्त में साक्षात् मुझ ही में लीन हो जाता है।
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