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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 54
आत्मन्यभेदेन विभावयन्निदं भवत्यभेदेन मयात्मना तदा । यथा जलं वारिनिधौ यथा पयः क्षीरे वियद्व्योम्न्यनिले यथानिलः ॥
जिस प्रकार समुद्र में जल, दूध में दूध, महाकाश में घटाकाशादि और वायु में वायु मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार इस सम्पूर्ण प्रपंच को अपने आत्मा के साथ अभिनरूप से चिन्तन करने से जीव मुझ परमात्मा के साथ अभिन्न भाव से स्थित हो जाता है।
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