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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 58
भ्रातर्यदीदं परिदृश्यते जग- न्मायैव सर्वं परिहृत्य चेतसा । मद्भावनाभावितशुद्धमानसः सुखी भवानन्दमयो निरामयः ॥
भाई! यह जो कुछ जगत्‌ दिखायी देता है, वह सब माया है। इसे अपने चित्त से निकालकर मेरी भावना से शुद्धचित्त और सुखी होकर आनन्दपूर्ण और क्लेशशून्य हो जाओ।
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