भाई! यह जो कुछ जगत् दिखायी देता है, वह सब माया है। इसे अपने चित्त से निकालकर मेरी भावना से शुद्धचित्त और सुखी होकर आनन्दपूर्ण और क्लेशशून्य हो जाओ।
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