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अध्याय 95 — अथ वायसविरुताध्यायः
बृहत्संहिता
62 श्लोक • केवल अनुवाद
पूर्व देशवासियों के दक्षिण भाग में कौआ और वाम भाग में करायिका तथा अन्य देशवासियों के वाम भाग में कौआ और दक्षिण भाग में करायिका शुभ होती है। लोक- प्रसिद्धि से पूर्व आदि देशों को जानना चाहिये ।
यदि कौआ बैशाख मास में उपद्रवरहित वृक्ष के ऊपर पोंसला बनावे तो सुभिक्ष और मंगल करने वाला होता है तथा निन्दित, काँटेदार या सूखे हुये वृक्ष पर पोंसला बनावे तो उस देश में दुर्भिक्ष का भय होता है।
यदि कौआ शरत्काल में वृक्ष के पूर्व दिशा में स्थित शाखा पर घोंसला बनावे तो पश्चिम दिशा में पहले वर्षा होती है तथा दक्षिण या उत्तर दिशा में घोंसला बनावे तो प्रधान वृष्टि होती है। अग्निकोण में घोंसला बनावे तो मण्डल वृष्टि ( कहीं पर वृष्टि और कहीं पर अवृष्टि) होती है।
नैऋत्य कोण में घोंसला बनावे तो शारदीय धान्यों को अच्छी निष्पत्ति होती है। परिशेष (वायव्य और ईशान) कोण में घोंसला बनावे तो सुभिक्ष और वायव्य कोण में पॉसता होने से अधिक चूहे भी होते हैं।
जिस देश में कौआ शरकण्डा, कुशा, गुल्म, लता, धान्य, प्रासाद, गृह और निम्न स्थान में घोंसले का निर्माण करे, वह देश चोर, अनावृष्टि और रोग से पीड़ित होकर शून्य हो जाता है।
यदि कौए के दो, तीन चार बच्चे हों तो सुभिक्ष, पाँच बच्चे हों तो दूसरे राजा का अधिकार तया यदि उसका अण्डा हो गिर जाय अथवा एक ही अण्डा दे या दे हो नहीं तो अमंगल होता है।
यदि कौए के बच्चे का वर्ण गन्धद्रव्य के समान हो तो चोरों की उत्पत्ति, चित्र- वर्णवत् हो तो मृत्यु, सफेद वर्ण हो तो, अग्नि का भय और किसी अंग हीन से हो तो दुर्भिक्ष का भय होता है।
रोषश्चक्राकारैरभिपातो यदि कौवे विना कारण गाँव के बीच में एकत्र होकर बहुत शब्द करें तो दुर्भिक्ष का भय, चक्र की तरह इकट्ठे होकर स्थित हों तो नगर का रोध और वर्ग-वर्ग करके स्थित हों तो उपद्रव होता है ।
यदि कौवे भयरहित होकर चोंच, पंख और पत्रों से मनुष्यों को मारें तो शत्रुवृद्धि तथा रात्रि में विचरण करें तो जन को क्षति होती है।
यदि कौये अाश में प्रदक्षिणक्रम से भ्रमण करें तो आत्मीय जनों से और अपसव्य क्रम से भ्रमण करें तो शत्रुओं से भय होता है तथा अति आकुलता के साथ भ्रमण करें तो देखने वाले की अनवस्थिति होती है।
यदि कौवे ऊपर को मुँह उठाकर पंखों को चलावें तो मार्ग में भय, धान्यों को चुरावें तो दुर्भिक्ष का भय, सेना के अंगों पर बैठ जाय तो युद्ध और कोयल के समान अति काले पंख कौवे के हों तो चोर का भय होता है।
यदि कौवे शय्या के ऊपर भस्म, हट्टी, केश और पत्ते डालें तो शय्या के स्वामी का वर्ष, मणि, फूल और फल डालें तो पुत्रजन्म तथा तृण, काठ आदि डालें तो कन्या का जन्म होता है।
यदि कौवे रेत, धान्य, गिलो मिट्टी, पुष्प या फल मुँह में भर कर अपने स्थान पर आवें तो धन का लाभ होता है तथा जल के समीप से कुछ बर्तन लेकर जायें तो भय देते हैं।
जिसके वाहन, शत्र, जूते और छत्र को छाया को कौआ कूटे उसका मरण, उन वाहन आदि को फूल आदि से पूजा करे तो उसको पूजा और उन पर वोट करे तो उसको भोजन का लाभ होता है।
कौआा जो कहीं से उठा कर ले आवे, उसका लाभ और जो से जाय उसका नारा होता है। पोले द्रव्य से सोना, कपाससम्बन्धी बस्तु से यत्र और सफेद वस्तु से रजत का लाभ या नाश होता है ।
दूध वाले गृध, अर्जुन गुछ, यद्भुत वृक्ष या नदी के दोनों तट पर स्थित होकर कौए शब्द करें या धूती अथवा जल से स्नान करें तो वर्षाकाल में दृष्टि तथा अन्य ऋतु में दुर्भिश्च करता है।
गुध के कोटर में अपरियत का भयंकर शब्द करे तो महाभय देने वाला होता है एवं जल देखकर या मेघगर्जन के बाद शब्द करे तो हि करने वाला होता है।
लता के वितान में सूर्याभिमुख और दुःखी होकर चञ्च से अपने शरीर को कूटे, पंख को चलावे तथा लाल द्रव्य या दुग्ध, तृण अथवा काष्ठ को घर में ले आवे तो अग्निभय करता है।
यदि कौआ गृहस्थों के घर पर स्थित होकर पूर्व आदि दीप्त दिशा की तरफ मुख करके शब्द करे तो क्रम से राजभय, चोरभय, बन्धन और कलह होता है। जैसे दीप्त पूर्व दिशा की तरफ मुख करके शब्द करे तो राजभय, दीप्त दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके शब्द करे तो चोरभय, दीप्त पश्चिम दिशा की तरफ मुख करके शब्द करे तो बन्धन और दीप्त उत्तर दिशा की तरफ मुख करके शब्द करे तो कलह होता है। साथ ही दीप्त विदिशाओं की तरफ मुख करके शब्द करे तो पशुओं को भय होता है।
यदि कौआ शान्त पूर्व दिशा को देखता हुआ शब्द करे तो राजपुरुष और मित्र का समागम, सुवर्ण का लाभ तथा शालिधान्य और गुड़मिश्रित भोजन का लाभ होता है।
यदि कौआ शान्त आग्नेय कोण को देखता हुआ शब्द करे तो अग्नि से जोविका करने वाले (सोनार, लोहार आदि) और युवती त्री का समागम तथा उत्तम धातु (सुवर्ण आदि) का लाभ होता है। यदि कौआ शान्त दक्षिण दिशा को देखता हुआ शब्द करे तो उड़द और कुलची का भोजन तथा गान विद्या जानने वाले के साथ समागम होता है।
यदि कौवा शान्त नैऋत्य कोण को देखता हुआ शब्द करे तो दूत, घोड़े का उपकरण, दही, तेल, मांस और भोज्य पदार्थ का लाभ होता है। यदि शान्त पश्चिम दिशा की तरफ देखता हुआ शब्द करे तो मांस, मद्य, आसव, धान्य और समुद्रोत्पन्न रत्नों का लाभ होता है।
यदि कौआ शान्त वायव्य दिशा को देखता हुआ शब्द करे तो शत्र, लोहा, आयुध (खड्ग आदि), कमल, लता, फल और भोजन का लाभ होता है। यदि शान्त उत्तर दिशा की तरफ मुख करके शब्द करे तो पायस भोजन, घोड़ा और बख का लाभ होता है।
यदि कौआ शान्त ईशान कोण की तरफ मुख करके शब्द करे तो घी से युक्त पक्ष्य पदार्थ और बैल का लाभ होता है। इसी प्रकार घर के पीछे स्थित कौए के फल भी गृहस्वामी को होते है।
यदि यात्राकाल में कान के बराबर होकर कौवा उड़े तो कुसल करता है; किन्तु कार्य की सिद्धि नहीं होती है तथा यात्रा करने वाले के सामने में शब्द करता हुआ आ जाम तो यात्रा में विप्न करता है।
यदि कौआ पहले यात्रा करने वाले के वाम भाग में शब्द करके फिर दक्षिण भाग ३० ५० द्वि०-३ में शब्द करे तो धन का अपहरण करने वाला होता है। इससे विपरीत हो (दक्षिण भाग में शब्द करके फिर वाम भाग में शब्द करे) तो अर्थ-सिद्धि करता है।
यदि गमन करने वाले के चाम भाग में स्थित कौआ पीछे की ओर गमनशील होकर बार-बार शब्द करे तो अर्थ, की सिद्धि होती है। पूर्व देशवासियों के दक्षिण में स्थित काक का भी इसी प्रकार का फल होता है अर्थात् यात्राकाल में पूर्व देशवासियों के दक्षिण में स्थित कौआ पौछे की ओर गमनशील होकर शब्द करे तो अर्थ की सिद्धि होती है।
गमन करने वाले के वाम भाग में स्थित कौआ प्रतिलोम गति वाला ( अभिमुख में आता हुआ) होकर शब्द करे तो यात्रा में विघ्न करता है; किन्तु यात्रा में जो अभिलपित फल होता है, वह घर बैठे हो मिल जाता है।
यदि कौआ गमन करने वाले के दक्षिण भाग में शब्द करके वाम भाग में शब्द करे तो अभिलषित अर्थ का लाभ होता है। यदि शब्द करके आगे होकर चला जाय तो गमन करने वाले को अधिक घंटे का लाभ होता है।
यदि कौआ पीठ की तरफ शब्द करके दक्षिण पार्क से होकर चला जाय तो गमन करने वाले के शरीर से किसी कारणवश खून निकलता है। यदि एक पाँव से खड़ा होकर सूर्य को देखता हुआ शब्द करे तो आगे खून निकलने का कारण होता है।
यदि कौवा एक पाँव से खड़ा होकर सूर्य को देखते-देखते अपनी चोंच से पंखों को कुरेदे तो भविष्य में किसी प्रधान पुरुष के वध को सूचित करता है।।३१।। अर्कमादित्यं दृष्ट्ा अवलोक्य एकपाद एकेनैव पादेन स्थितस्तुण्डेन चक्ष्वा स्वपिच्छा- न्यात्मीयान्यङ्गरुहाणि यदा बलिभुक् काकी लिखेत्, तदा पुरतो महतः प्रधानस्य जनस्य बर्थ मृत्युमभिधत्ते ददाति ।
यदि धान्यसहित खेत की शान्ता दिशा में स्थित होकर काक शब्द करे तो धान्य- सहित भूमि का लाभ होता है तथा गाँव की सीमा के अन्त में स्थित होकर व्याकुलतापूर्वक शब्द करे तो गमन करने वाले को क्लेश करने वाला होता है।
स्निग्ध पत्ते, नवीन पल्लव, फूल और फलों से नम्र, सुगन्धियुत, मधुर, छिद्ररहित और मनोहर वृक्ष पर स्थित काक अर्थ-सिद्धि करने वाला होता है।
पके हुये धान्य वाले स्थान, दूबयुक्त गृह, देवगृह, हर्म्य, हरा स्थान, धन्य (शुभ) स्थान, ऊँचे स्थान और प्रशस्त स्थान में स्थित काक शब्द करे तो धन की प्राप्ति होतो है।
गौ की पूँछ या वल्मीक पर बैठा हुआ काक शब्द करे तो सर्प का दर्शन, भैंस पर बैठा हुआ काक बोले तो शीघ्र ज्वर और गुल्म पर बैठा हुआ काक बोले तो अल्प शुभाशुभ फल होता है।
तृण के ढेर पर या वाम भागगत जल में बैठा हुआ काक बोले तो कार्य का विनाश होता है तथा ऊर्ध्व भाग में अग्निदग्ध या बिजली से हत वृक्ष पर बैठा हुआ काक शब्द करे तो वध होता है।
काँटेदार सौम्य (दूध वाले) वृक्ष पर बैठा हुआ काक कार्य की सिद्धि और कलह करता है। केवल काँटेदार वृक्ष पर बैठा हुआ काक कार्य की असिद्धि और लताओं से बेष्टित वृक्ष पर बैठा हुआ काक बन्धन करता है।
यदि काक ऊपर से कटे हुये वृक्ष पर बैठा हो तो अङ्गच्छेद, सूखे पृक्ष पर बैठा हो तो कलह और आगे या पीछे गोबर पर बैठा हो तो धन का लाभ करता है।
मृत पुरुष के अंगों पर स्थित होकर बोलता हुआ काक गमन करने वाले के सामने पड़े तो मृत्यु का भय होता है तथा चोंच से हड्डी को तोड़ता हुआ काक शब्द करे तो गमन करने वाले की हड्डी टूटने का कारण होता है ।
यदि कौआ रस्सरी, हट्टी, काष्ठ, कांटेदार वस्तु, असार वस्तु और केश को मुख में लेकर शब्द करे तो क्रम से सर्प, रोग, दंष्ट्री ( सूअर आदि), चोट, शत्र और अग्नि का भय करता है।
यदि कौआ सफेद फूल, अपवित्र वस्तु और मांस को मुख में लेकर शब्द करे तो गमन करने वाले के अभीष्ट अर्थ को सिद्धि होती है। पंखों को कँपाते हुये ऊपर को मुख करके बार-बार शब्द करे तो यात्रा में विघ्न होता है।
यदि कौआ लोहे की जञ्जीर, बरत्रा (चमड़े की रस्सी) और लता को मुख में लेकर शब्द करे तो बन्धन होता है तथा पत्थर पर बैठा हुआ काक मार्ग में अपरिचित मनुष्य का समागम करता है।
यदि दो कौवे परस्पर एक-दूसरे के मुख में भोजन देते हों तो गमन करने वाले को उत्तम तुष्टि का लाभ होता है तथा नर-मादा दोनों साथ-साथ शब्द करें तो त्री का लाभ होता है।
स्त्री के मस्तक-यत जलपूर्ण पड़े पर बैठा हुआ फौआ स्त्री का लाभ कराता है। घड़े को ताड़न करे तो पुत्र का मरण होता है तथा घड़े पर बीट कर दे तो भोजन का लाभ होता है।
यात्रा में गया हुआ राजा जहाँ पर निवास करता है, उसको 'स्कन्धावार' कहते हैं। स्कन्धावार आदि के निर्माण काल में पंखों को चलाता हुआ काक शब्द करे तो दूसरे स्थान में निवास करने को सूचित करता है तथा पंखों को स्थिर करके शब्द करे तो जनभर को मचित करता है: स्थानान्तर गमन को नहीं।
यदि गिद्ध और कडू पक्षी के साथ कौए विना मांस के सेना आदि ( पुर और गाँव में परस्पर विरोघरहित होकर ) प्रवेश करें तो शत्रु के साथ स्नेह एवं कलह करते हुये प्रवेश करें तो युद्ध होता है।
सूअर पर स्थित काक हो तो बन्धन, कीचड़ से लिपटे हुये सूअर पर स्थित काक हो तो धन का लाभ तथा गदहे और ऊँट पर स्थित काक हो तो क्षेम करता है। किसी का मत है कि गदहे पर स्थित काक वध करता है।
घोड़े पर बैठा काक शब्द करे तो वाहन का लाभ होता है तथा पीछे-पीछे चलता हुआ काक शब्द करे तो खून गिरता है। काक को छोड़कर अन्य पक्षी गण भी गमन करने वाले के पीछे चलें तो काक की तरह ही फल देते हैं।
द्वात्रिंशद्विभक्त दिक्चक्र में जिस प्रकार फल कहा गया है, उसी प्रकार गमन करने वालों को गुण-दोष-फल कहना चाहिये। शान्त पूर्व दिशा में स्थित शकुन शुभ, अशुभ शकुन मध्यम फल, दीप्त पूर्व दिशा में क्रूर चेष्टा वाले शकुन राजा से भय इत्यादि की तरह फल कहना चाहिये ।
अपने घोसले में अवस्थित काक का 'का' शब्द निष्फल, 'कव' शब्द अपनी प्रसत्रता के लिये, 'क' शब्द प्रिय की प्राप्ति कराने वाला
कर' शब्द कलह कराने वाला 'कुरु- कुरु' शब्द आनन्द कराने वाला, 'कट कट' शब्द दही-भोजन कराने वाला एवं 'केके' और 'कुकु' शब्द गमन करने वाले को धनप्राप्ति कराने वाला होता है।
काक का 'खरे खरे' शब्द पथिक के आगमन को कहता है, 'कखाखा' शब्द गमन करने वाले की मृत्यु को सूचित करता है, 'आ' शब्द यात्रा में विघ्न उपस्थित करता है और 'कखला' शब्द सद्यः (उसी दिन वर्षा के लिये होता है।
काक का 'काक' शब्द विनाश करता है, 'ककाटि' शब्द भोजन में विष आदि दोष को, 'कवकव' शब्द प्रोत्यास्पद ( किसी से प्रीति) को और इसी प्रकार 'कगाकु' शब्द बन्धन को सूचित करता है।
काक का 'करी' शब्द करने पर वर्षा होती है। 'गुड' शब्द भय के लिये होता है, 'वड' शब्द बखलाम कराने वाला होता है और 'कलय' शब्द ब्राह्मणों के साथ शूद्र का समागम कराता है।
काक का 'कड' शब्द अभीष्ट फल प्राप्ति और शुभ देने वाले सर्प का दर्शन कराता है तथा 'टट्ट' शब्द घात, 'स्त्री' शब्द स्त्री-लाभ, 'गड्' शब्द गायों का लाभ और 'पुड्' शब्द फूलों का लाभ कराता है।
यदि कौवा 'टाकुटाकु' शब्द करे तो युद्ध का कारण, 'गुहु' शब्द करे तो अग्निभय, 'कटेकटे' शब्द करे तो कलह और 'टाकुलि, चिण्टिचि, केकेका' शब्द करे तो दोष के लिये होता है।
शब्द, चेष्टा, भोजन और उपवेशन के द्वारा एक काक का जो फल कहा गया है, वहीं दो, तीन आदि का भी जानना चाहिये तथा अन्य अनुक्त पक्षीगण का भी फल काक की तरह ही जानना चाहिये। इसी प्रकार वन में रहने वाले जन्तु और उपरिदंष्ट्री ( सूअर आदि) का फल कुत्ते की तरह जानना चाहिये ।
मरणमपि न नीला मक्षिका मूर्ध्नि स्थलचारी (अजादि) जीव जलचारी और जलचारी (मछली आदि) जीव स्थल- चारी हों तो वर्षाकाल में बहुत वृष्टि के लिये तथा अन्य ऋतु में भय के लिये होते हैं। यदि मधुमक्खियाँ घर में छत्ता लगायें तो शीघ्र ही उस भवन को जनशून्य करती है तथा नील वर्ण वाली मक्खियाँ जिस मनुष्य के शिर पर बैठें, उसकी मृत्यु होती है।
यदि चीटियाँ अपने अण्डे को जल में डालें तो वर्षा का अभाव होता है। जब वही चोटियाँ अण्डे को वृक्ष पर या उच्च स्थान पर ले जाय तब वृष्टि होती है।
यात्रा आदि कार्यों के आरम्भकाल में जिस तरह का शकुन दिखाई देता है, उसी तरह कार्य के अन्त तक शुभाशुभ फल होता है तथा कार्य के मध्य में जो शकुन दिखाई देता है, उसका फल उसी दिन हो जाता है। इस अध्याय में जो शकुन कहे गये हैं, उनका सब समय में विचार करना चाहिये। समस्त कार्यों के आरम्भ-समय में, यात्रा- काल में और गृहप्रवेश आदि कार्यों में पूर्वोक्त सभी शकुनों का विचार करना चाहिये तथा किसी भी कार्य में छींक शुभ नहीं होता है।
वे पूर्वोक्त शकुन माननीय राजा के शुभ दशा फल, निर्विघ्नपूर्वक कार्य का साधन, मूल स्थान का पालन, मार्ग में सहायक, दुष्ट शत्रु का साधन, आरोग्य-इन सबों को शुभ चेष्टाओं के द्वारा सूचित करते हैं।
कोई-कोई (काश्यप आदि आचार्य) कहते हैं कि एक कोस चले जाने के बाद शकुन का शब्द निष्फल होता है तथा यात्राकाल में यदि पहला शकुन अशुभ हो तो ग्यारह प्राणायाम और दूसरा शकुन अशुभ हो तो सोलह प्राणायाम करना चाहिये। लेकिन यदि तीसरा शकुन अशुभ हो तो घर लौट आना चाहिये।
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