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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 16
सक्षीरार्जुनवनुलकूलद्वयपुलिनगा रुवन्तश। प्रावृषि वृष्टिं दुर्दिनमनृती स्नाताच पांशुजलैः ॥
दूध वाले गृध, अर्जुन गुछ, यद्भुत वृक्ष या नदी के दोनों तट पर स्थित होकर कौए शब्द करें या धूती अथवा जल से स्नान करें तो वर्षाकाल में दृष्टि तथा अन्य ऋतु में दुर्भिश्च करता है।
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