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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 3
नीडे प्राक्शाखायां शरदि भवेत्प्रथमवृष्टिरपरस्याम्। याम्योत्तरयोर्मध्यात् प्रधानवृष्टिस्तरोरुपरि ॥
यदि कौआ शरत्काल में वृक्ष के पूर्व दिशा में स्थित शाखा पर घोंसला बनावे तो पश्चिम दिशा में पहले वर्षा होती है तथा दक्षिण या उत्तर दिशा में घोंसला बनावे तो प्रधान वृष्टि होती है। अग्निकोण में घोंसला बनावे तो मण्डल वृष्टि ( कहीं पर वृष्टि और कहीं पर अवृष्टि) होती है।
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