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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 60
कार्य तु मूलशकुनेऽन्तरजे तदह्नि विन्द्यात् फलं नियतमेवमिमे विचिन्त्याः । प्रारम्भयानसमयेषु तथा प्रवेशे ग्राह्यं श्रुतं न शुभदं क्वचिदप्युशन्ति ॥
यात्रा आदि कार्यों के आरम्भकाल में जिस तरह का शकुन दिखाई देता है, उसी तरह कार्य के अन्त तक शुभाशुभ फल होता है तथा कार्य के मध्य में जो शकुन दिखाई देता है, उसका फल उसी दिन हो जाता है। इस अध्याय में जो शकुन कहे गये हैं, उनका सब समय में विचार करना चाहिये। समस्त कार्यों के आरम्भ-समय में, यात्रा- काल में और गृहप्रवेश आदि कार्यों में पूर्वोक्त सभी शकुनों का विचार करना चाहिये तथा किसी भी कार्य में छींक शुभ नहीं होता है।
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