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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 61
शुभं दशापाकमविघ्नसिद्धिं मूलाभिरक्षामथवा सहायान् । दुष्टस्य संसिद्धिमनामयत्वं वदन्ति ते मानयितुर्नृपस्य ॥
वे पूर्वोक्त शकुन माननीय राजा के शुभ दशा फल, निर्विघ्नपूर्वक कार्य का साधन, मूल स्थान का पालन, मार्ग में सहायक, दुष्ट शत्रु का साधन, आरोग्य-इन सबों को शुभ चेष्टाओं के द्वारा सूचित करते हैं।
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