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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 51
करेति कलहं कुरुकुरु च हर्षमथ कटकटेति दधिभक्तम्। केके विरुतं कुकु वा धनलाभं यायिन प्राह ॥
कर' शब्द कलह कराने वाला 'कुरु- कुरु' शब्द आनन्द कराने वाला, 'कट कट' शब्द दही-भोजन कराने वाला एवं 'केके' और 'कुकु' शब्द गमन करने वाले को धनप्राप्ति कराने वाला होता है।
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