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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 62
क्रोशादूर्ध्व शकुनविरुतं निष्फलं प्राहुरेके तत्रानिष्टे प्रथमशकुने मानयेत् पञ्च षट् च । प्राणायामानृपतिरशुभे षोडशैव द्वितीये प्रत्यागच्छेत् स्वभवनमतो यद्यनिष्टस्तृतीयः ॥
कोई-कोई (काश्यप आदि आचार्य) कहते हैं कि एक कोस चले जाने के बाद शकुन का शब्द निष्फल होता है तथा यात्राकाल में यदि पहला शकुन अशुभ हो तो ग्यारह प्राणायाम और दूसरा शकुन अशुभ हो तो सोलह प्राणायाम करना चाहिये। लेकिन यदि तीसरा शकुन अशुभ हो तो घर लौट आना चाहिये।
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