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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 4
शिखिदिशि मण्डलवृष्टिनैर्ऋत्यां शारदस्य निष्पत्तिः । परिशेषयोः सुभिक्षं मूषकसम्पच्च वायव्ये ॥
नैऋत्य कोण में घोंसला बनावे तो शारदीय धान्यों को अच्छी निष्पत्ति होती है। परिशेष (वायव्य और ईशान) कोण में घोंसला बनावे तो सुभिक्ष और वायव्य कोण में पॉसता होने से अधिक चूहे भी होते हैं।
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