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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 36
कार्यस्य व्याघातस्तृणकूटे वामगेऽम्बुसंस्थे वा। ऊर्ध्वाऽग्निप्लुष्टेऽ शनिहते च काके वधो भवति ॥
तृण के ढेर पर या वाम भागगत जल में बैठा हुआ काक बोले तो कार्य का विनाश होता है तथा ऊर्ध्व भाग में अग्निदग्ध या बिजली से हत वृक्ष पर बैठा हुआ काक शब्द करे तो वध होता है।
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