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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 53
काकेति विघातः काकटीति चाहारदूषणं प्राह । पीत्यास्पदं कवकवेति बन्धमेवं कगाकुरिति ॥
काक का 'काक' शब्द विनाश करता है, 'ककाटि' शब्द भोजन में विष आदि दोष को, 'कवकव' शब्द प्रोत्यास्पद ( किसी से प्रीति) को और इसी प्रकार 'कगाकु' शब्द बन्धन को सूचित करता है।
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