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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 10
सव्येन खे भ्रमद्भिः स्वभयं विपरीतमण्डलैश्च परात् । अत्याकुलं भ्रमद्भिर्वातो‌द्वामो भवति काकैः ॥
यदि कौये अाश में प्रदक्षिणक्रम से भ्रमण करें तो आत्मीय जनों से और अपसव्य क्रम से भ्रमण करें तो शत्रुओं से भय होता है तथा अति आकुलता के साथ भ्रमण करें तो देखने वाले की अनवस्थिति होती है।
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