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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 37
कण्टकिमिने सौम्ये सिद्धिः कार्यस्य भवति कलहश्च। कण्टकिनि भवति कलहो वल्लीपरिवेष्टिते बन्यः ॥
काँटेदार सौम्य (दूध वाले) वृक्ष पर बैठा हुआ काक कार्य की सिद्धि और कलह करता है। केवल काँटेदार वृक्ष पर बैठा हुआ काक कार्य की असिद्धि और लताओं से बेष्टित वृक्ष पर बैठा हुआ काक बन्धन करता है।
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