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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 58
स्थलसलिलचराणां व्यत्ययो मेघकाले प्रचुरसलिलवृष्ट्यै शेषकाले भयाय । मधु भवननिलीनं
मरणमपि न नीला मक्षिका मूर्ध्नि स्थलचारी (अजादि) जीव जलचारी और जलचारी (मछली आदि) जीव स्थल- चारी हों तो वर्षाकाल में बहुत वृष्टि के लिये तथा अन्य ऋतु में भय के लिये होते हैं। यदि मधुमक्खियाँ घर में छत्ता लगायें तो शीघ्र ही उस भवन को जनशून्य करती है तथा नील वर्ण वाली मक्खियाँ जिस मनुष्य के शिर पर बैठें, उसकी मृत्यु होती है।
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