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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 18
दीप्तोद्विग्नो विटपे विकुट्टयन् वह्निकृद्विधुतपक्षः । रक्तद्रव्यं दग्धं तृणकाष्ठं वा गृहे विदधत् ॥
लता के वितान में सूर्याभिमुख और दुःखी होकर चञ्च से अपने शरीर को कूटे, पंख को चलावे तथा लाल द्रव्य या दुग्ध, तृण अथवा काष्ठ को घर में ले आवे तो अग्निभय करता है।
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