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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 49
द्वात्रिंशत्प्रविभक्ते दिक्चक्रे यद्यथा समुद्दिष्टम्। तत्तत्तथा विधेयं गुणदोषफलं वियासूनाम् ॥
द्वात्रिंशद्विभक्त दिक्चक्र में जिस प्रकार फल कहा गया है, उसी प्रकार गमन करने वालों को गुण-दोष-फल कहना चाहिये। शान्त पूर्व दिशा में स्थित शकुन शुभ, अशुभ शकुन मध्यम फल, दीप्त पूर्व दिशा में क्रूर चेष्टा वाले शकुन राजा से भय इत्यादि की तरह फल कहना चाहिये ।
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