करगौ विरुते वर्ष गुडवत्, त्रीसाय वडिति वस्त्राप्तिः । कलयेति च संयोगः शूद्रस्य ब्राह्मणैः साकम् ॥
काक का 'करी' शब्द करने पर वर्षा होती है। 'गुड' शब्द भय के लिये होता है, 'वड' शब्द बखलाम कराने वाला होता है और 'कलय' शब्द ब्राह्मणों के साथ शूद्र का समागम कराता है।
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