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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 28
वामः प्रतिलोमगतिर्विरुवन् गमनस्य विघ्नकृद्भवति । तत्रस्थस्यैव फलं कथयति तद्वाञ्छितं गमने ॥
गमन करने वाले के वाम भाग में स्थित कौआ प्रतिलोम गति वाला ( अभिमुख में आता हुआ) होकर शब्द करे तो यात्रा में विघ्न करता है; किन्तु यात्रा में जो अभिलपित फल होता है, वह घर बैठे हो मिल जाता है।
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