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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 35
गोपुच्छस्थे वल्मीकगेऽथवा दर्शनं भुजङ्गस्य । सद्यो ज्वरो महिषगे विरुवति गुल्मे फलं स्वल्पम् ॥
गौ की पूँछ या वल्मीक पर बैठा हुआ काक शब्द करे तो सर्प का दर्शन, भैंस पर बैठा हुआ काक बोले तो शीघ्र ज्वर और गुल्म पर बैठा हुआ काक बोले तो अल्प शुभाशुभ फल होता है।
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