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बृहत्संहिता • अध्याय 95 • श्लोक 40
रज्ज्वस्थिकाष्ठकण्टकिनिः सारशिरोरुहानने रुवति । भुजगगददंष्ट्रितस्करशस्त्राग्निभयान्यनुक्रमशः ॥
यदि कौआ रस्सरी, हट्टी, काष्ठ, कांटेदार वस्तु, असार वस्तु और केश को मुख में लेकर शब्द करे तो क्रम से सर्प, रोग, दंष्ट्री ( सूअर आदि), चोट, शत्र और अग्नि का भय करता है।
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