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अध्याय 43 — अथेन्द्रध्वजसम्पदाध्यायः

बृहत्संहिता
67 श्लोक • केवल अनुवाद
सभी देवताओं ने ब्रह्माजी से कहा, हे भगवन्! राक्षसों के साथ युद्ध करने के लिये हम समर्थ नहीं हैं, अतः आपकी शरण में आये हैं।
भगवान् ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा- क्षीरसागर में भगवान् नारायण विराजमान हैं। वे एक केतु (ध्वज) आपको देंगे, जिसको देखकर राक्षसगण युद्ध में नहीं ठहरेंगे।
इस तरह वर प्राप्त कर इन्द्र के साथ देवताओं ने क्षीरसागर जाकर भगवान् नारायण की इस प्रकार स्तुति की- श्रीवत्सचिह्न से युत, कौस्तुभ मणि की किरणों से प्रकाशित वक्षःस्थल वाले,
लक्ष्मीनाथ, अचिन्त्य, अनौपम्य, सभी प्राणियों में गत होने के कारण सम, सभी प्राणियों के द्वारा बड़ी कठिनता से जानने योग्य होने के कारण सूक्ष्म, परमात्मा, अनादि (उत्पत्ति-रहित), विष्णु (व्यापक), अज्ञात निधन बाले- इस तरह इन्द्र के साथ देवताओं से संस्तुत
स देव नारायण ने सन्तुष्ट होकर राक्षस और देवताओं के खियों के मुखरूप कमल-वन में क्रम से चन्द्र और सूर्य के समान (राक्षसों की खियों के मुखकमल प्लान करने के कारण चन्द्र और देवताओं की खियों के मुखकमल को प्रफुल्लित करने के कारण सूर्य की तरह) ध्वज देवताओं को दिया।
विष्णु के तेज से उत्पन्न, आठ चक्रों से युत, प्रकाशित तथा मणियों से भूषित रथ पर स्थित और शारदीय सूर्य की तरह प्रकाशमान ध्वज पाकर इन्द्र बहुत प्रसन्न हुये ।
किङ्किणियों (सूक्ष्म घण्टाओं) के समूह से भूषित, माला, छत्र, घण्टा और पिटक ( ध्वजा में लगाने का एक प्रकार का भूषण) से युत उत्रत ध्वज के द्वारा युद्ध में शत्रु की सेना का नारा किया।
इन्द्र ने ऊपर गमन करने वाले (भूमि पर रहते हुये भी स्वर्ग जाने वाले) चेदि देश के राजा वसु को एक बाँस का दण्ड दिया, जिसका विधिपूर्वक चेदिपति राजा ने पूजन किया।
राजा वसु की पूजा से प्रसन्न होकर इन्द्र ने कहा- राजा वसु की तरह जो राजा उत्सव करेगा, वह अनेक प्रकार के रत्नों से युत पृथ्वी पर आदेश जरने वाला राजा होगा।
उस राजा के प्रजागण हर्षयुत, भय-रोग से रहित और बहुत अत्रों से युत होंगे तथा संसार में कारणों के द्वारा ध्वज ही शुभाशुभ फल कहेगा।
पूर्व काल में इन्द्र की आज्ञा से बल की वृद्धि और जय की इच्छा रखने वाले राजाओं ने जिस तरह उस ध्वज का पूजन किया, शाख से लेकर उसको मैं कहता हूँ।
शुभ करण ( ९९ अध्याय के ४-५ श्लोक में उक्त), शुभ दिन, शुभ नक्षत्र, शुभ सकुन और शुभ मुहूर्त (यात्रा में उक्त मुर्त में ज्योतिषी और बढ़ई को वन में गमन करना चाहिये ।
उद्यान (फुलवाड़ी), देवालय, श्मशान, वल्मीक (वमई दिवड़ा भीड़), मार्ग तथा यज्ञभूमि में उत्पत्र, कुबड़ा, खड़े ही सूख गये, काँटेदार, लताओं से युत
वन्दाकवृक्ष से युत, बहुत पक्षियों के घोंसले वाले, बायु से टूटे हुये, आग से जले हुये और खीलिङ्ग नाम बाले (कदली, बदली आदि) वृक्षों के अतिरिक्त शुभ वृक्ष इन्द्रध्वज के लिये काटे गये।
अर्जुन (काहू), अजकर्ण, प्रियक, धव और गूलर-ये पाँच वृक्ष ध्वज के लिये शुभ होते हैं। इनमें एक या अन्य वृक्ष वक्ष्यमाण शुभ लक्षणों से युत हैं।।१५।। अर्जुनो वृक्षः श्रेष्ठः प्रशस्तः। अजकर्णः। प्रियकः। धवः। उदुम्बरः। एते पञ्च श्रेष्ठाः। एतेषां मध्यादेकतममन्यतमम्। अथवाऽपरमन्यं वृक्षं प्रशस्तं शुभलक्षणमित्यर्थः ।
श्वेत या काली भूमि में उत्पत्र (शुभ लक्षणयुत) वृक्ष के पास जाकर ब्राह्मण जन- रहित स्थान में रात्रि के समय विधिपूर्वक पूजन के बाद वृक्ष को स्पर्श करके वक्ष्यमाण मन्त्र बोले ।
इस वृक्ष पर जितने जन्तु हैं, सबके लिये शुभ हो, आप सबों के लिये मैं नमस्कार करता हूँ, इस बलि को ग्रहण करके आप सब दूसरी जगह बास करें।
हे प्रधान वृक्ष! आपके लिये शुभ हो, इन्द्रध्वज के लिये राजा आपको पाने की इच्छा कर रहा है। अतः मेरी की हुई पूजा ग्रहण करें।
बाद में सूर्योदय के समय उत्तर या पूर्व-मुख होकर वृक्ष को काटे। परशु (फरसा = कुल्हार) का जर्जर शब्द निकलना शुभ नहीं है, किन्तु मधुर और घने शब्द का निकलना शुभ है।
अखण्डित या अवक्र होकर और पूर्व या उत्तर दिशा में वृक्ष का गिरना राजा की विजय करने वाला होता है। इनसे भित्र लक्षणयुत होकर (खण्डित या वक्र होकर आग्नेय, दक्षिण, नैर्ऋत्य, पश्चिम या वायव्य कोण में) वृक्ष का गिरना अशुभ है।
इस वृक्ष के आगे से चार अद्गुल और मूल से आठ अङ्गुल काटकर यष्टि (मध्यभाग) को जल में डाल देना चाहिये। बाद में जल से निकाल कर गाड़ी या मनुष्यों के द्वारा पुरद्वार पर उसको लाना चाहिये ।
लकड़ी लाने के समय गाड़ी का आरा टूट जाय तो सेनाओं में भेद, नेमि (हाल) टूट जाय तो सेनाओं का नाश, अक्ष (पुरा) टूट जाय तो धन का नाश और अणि (कुलावा) टूट जाय तो बढ़ई का नाश होता है।
भाद्र शुक्ल अष्टमी के दिन नगर में रहने वाले मनुष्य, ज्यौतिषी, मन्त्री, कञ्झुकी और सुन्दर बेषधारी प्रधान ब्राह्मणों के साथ होकर
राजा पुरवासियों के द्वारा नवीन वस्त्र से ढको हुई, माला, गन्ध और धूपों से युत यष्टि को शङ्ख और तुरही के शब्दों के साथ पुर में प्रवेश कराना चाहिये।
मनोहर पताका, तोरण और वनमालाओं से भूषित, हर्षित मनुष्यों से युत, शोधित और संजाये हुये मागों से युत,
सुन्दर वेप वाली वेश्याओं से व्याप्त, सजी हुई दुकानों से युत, अधिक पुण्याह और वेद के शब्दों से युत, नट, नाचने वाले और गान विद्या जानने बालों से व्याप्त चतुष्पथ (चौराहे) वाला नगर होना चाहिये ।
उस नगर में श्वेत वर्ण की पताका विजय के लिये, पीत वर्ण की रोग देने वाली, अनेक वर्ण को विजय कराने के लिये और रक्त वर्ण की पताका शस्त्रप्रकोप के लिये होती है।
नगर में प्रवेश कराती हुई यष्टि को यदि हाथी, घोड़ा आदि कोई जीव गिरा दे तो भय के लिये एवं उस समय बालक तालियाँ बजावें या गायों में परस्पर लड़ाई हो तो युद्ध के लिये होतों है।
४८५ फिर बई विधिपूर्वक यष्टि को छीलकर खराज पर चढ़ावे। राजा आगे आने वाली एकादशी में जागरण करे। घेत वख और पगड़ी बाँधे हुए
घेत वख और पगड़ी बाँधे हुए पुरोहित इन्द्र दैवत और विष्णु दैवत मन्त्रों से अग्नि में हवन करे और सांवत्सर (ज्यौतिषी) अग्नि के शुभाशुभ चिह्नों को ग्रहण करे।
अभिलपित द्रव्यों के समान, सुगन्धयुत, निर्मल, घना और लपटदार अग्नि शुभ करने वाली और इससे भित्र लक्षणयुत अग्नि अशुभ करने वाली होती है। इस सम्बन्ध को लेकर योगयात्रा नामक ग्रन्थ में मैंने विस्तारपूर्वक कहा है।
यदि स्वाहा के अवसान (पूर्णाहुति देने के समय स्वयं प्रज्वलित शिखा वाली निर्मल और दक्षिणावर्त क्रम से चलती हुई शिखा वाली अग्नि हो तो गङ्गा और यमुना के जलरूपी सुन्दर हार बाली, समुद्ररूपी मेखला (तगड़ी) वाली पृथ्वी को राजा अपने वश में करता है, अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी का राजा होता है।
यदि सुवर्ण, अशोक, कुरण्टक, वैदूर्य मणि या नील कमल के समान कान्ति वाली अग्नि हो तो हवन कराने वाले राजा के भवन में ठहरने के लिये रत्नों की किरणों से नष्ट होकर अन्धकार अवकाश नहीं पाता है।
यदि अग्नि में समुद्र, मेघ, हाथी या नगाड़े के समान शब्द हो तो उस राजा के गमन करने के समय मदमत्त हाथियों से व्याप्त दिशायें अन्धकार की तरह हो जाती हैं अर्थात् उस राजा के पास हाथियों की अधिकता होती है।
पताका, घड़ा, घोड़ा या हाथियों के समान अग्नि हो तो उदयाचल और अस्ताचलरूप ओष्ठ, हिमालय और विन्ध्याचलरूप स्तन वाली पृथ्वी उस राजा के वश में हो जाती है।
यदि अग्नि में हाथियों के मदनल, लाजा (खीलें लाई = लावा), घी या शहद के समान सुगन्धि हो तो हवन कराने वाले राजा को प्रणाम करते हुये राजाओं के मुकुटों आगे की अधि रंगी गई-सो दिखाई देती है।
इन्द्रध्वज उठाने के समय अग्नि के स्वरूप द्वारा जो शुभाशुभ फल कहे गये हैं, उनका जन्मसमय, यज्ञकाल, ग्रहशान्ति, यात्रा और विवाहकाल में भी विचार करना चाहिये।
गुड़, पूप ( पिट्टी), पायस और दक्षिणाओं से ब्राह्मणों की पूजा करके श्रवण नक्षत्रयुत द्वादशी तिथि में या श्रवण नक्षत्रयुत अन्य किसी तिथि में ध्वजा को उठाना चाहिये ।
ध्यजा के ऊपर पाँच या सात शक्र कुमारी बनाना चाहिये- ऐसा मनु ने कहा है। ध्वजा को ऊँचाई से चौधाई कम नन्दा, ध्वजा के आधा तुल्य उपनन्दा, ध्वजा से सोलहवाँ भाग
धिक जय और विजय, जय और विजय से सोलहवाँ भाग अधिक दो वसुन्धरा तथा सबके बीच में वसुन्धरा से आठवाँ भाग अधिक शक्र जनित्री वनानी चाहिये।
पूर्व समय में हर्षित देवताओं ने इन्द्रध्वज को जो आभूषण दिये थे, क्रमानुसार उन विचित्र रूपपिटकों (आभूषणों से इस ध्वज को भूषित करना चाहिये।
विश्वकर्मा ने लाल अशोक के समान कान्ति वाला चौकोर प्रथम आभूषण इन्द्रध्वज को दिया। ब्रह्मा और शंकर ने अनेक रंग वाली दूसरी रशना ( तगड़) दी।
इन्द्र ने नील और लाल वर्णयुत आठ कोण वाला तृतीय आभूषण दिया। यमराज ने काला, कान्तियुद्ध मसूरक नामक चौथा आभूषण दिया।
वरुण ने मझीठ के समान कान्ति वाला, जलावतं कां तरह और छ: कोण वाला पाँचवाँ आभूषण दिया। वायु ने मयूर के पंख से व्याप्त और मेघ के समान नील वर्ण वाला छठा आभूषण केयूर दिया।
। कात्तिकेय ने अपना अनेक वर्ण का केयूर नामक सातवाँ आभूषण दिया। अग्नि ने अग्निशिखा की तरह कान्ति वाला और गोलाकार आठवाँ आभूषण दिया। इन्द्र ने वैदूर्यमणि के समान कान्ति वाला नवम कण्ठ का भूषण दिया।
कात्तिकेय ने अपना अनेक वर्ण का केयूर नामक सातवाँ आभूषण दिया। अग्नि ने अग्निशिखा की तरह कान्ति वाला और गोलाकार आठवाँ आभूषण दिया। इन्द्र ने वैदूर्यमणि के समान कान्ति वाला नवम कण्ठ का भूषण दिया।
विश्वदेव ने कमल के समान उद्वंशसंज्ञक ग्यारहवाँ भूषण दिया। मुनियों ने नीलकमल के समान कान्ति बाला निवेश नामक वारहवाँ भूषण दिया। बृहस्पति और शुक्र ने कुछ नीचे-ऊपर बना हुआ,
आगे के भाग में विस्तृत और लाक्षारस के समान लोहित वर्ण का तेरहवाँ भूपण शिर में दिया। जिस-जिस देवता ने इन्द्रध्वज के लिये जो-जो भूषन बनाया, वही उस भूषण के देवता हैं, यह पण्डितों को जानना चाहिये ।
ध्वजा के तृतीयांश प्रथम पिटक को परिधि, द्वितीय आदि वारह पिटक अपने से पूर्व पिटक से अष्टमांश कम करना चाहिये। जैसे- अष्टमांशोन-प्रथम-द्वितीय, अष्टमांशोन- द्वितीय-तृतीय, अष्टमांशोन-तृतीय-चतुर्थ, अष्टमांशोन-चतुर्थ-पञ्चम, अष्टमांशोन- पञ्चम-षष्ठ, अष्टमांशोन-षष्ठ-सप्तम, अष्टमांशोन- सप्तम-अष्टम, अष्टमांशोन-अष्टम- नवम, अष्टमांशोन-नवम-दशम, अष्टमांशोन-दशम-एकादश, अष्टमांशोन-एकादश- द्वादश और अष्टमांशोन- द्वादश-त्रयोदश पिटक बनाना चाहिये ।
शास्त्रज्ञ ( इन्द्रध्वज-लक्षण को जानने वाले) चौचे (पूर्णिमा के दिन पिटकों से इन्द्रध्वज को भूषित करें और नियत होकर मनु राजा द्वारा आगम से प्रतिपादित वक्ष्यमाण मन्त्रों को पढ़ें।
महादेव, सूर्य, यन, इन्द्र, चन्द्र, कुबेर, अग्नि, वरुण, महर्षिगण, सब दिशायें, अप्सरायें, शुक्र, बृहस्प िकार्तिकय और वायुओं के समुदायों के द्वारा जिस तरह प्रकाशमान
अनेक रूप वाले, श्रेष्ठ आभूषणों से पूजित हुये हैं, हे देव। उसी तरह इस यज्ञ में प्रसत्र मन होकर उन सब आभूषणों को ग्रहण करें।
एक रूप, व्यापक, चराह रूप, प्रधान पुरुष, चिरन्तन, यम स्वरूप, सबका संहार करने वाले, अग्नि, सहस शिर चांले, इन्द्र और स्तुति के योग्य तुम हो।
अग्नि, पालन करने वाले, इन्द्र, अच्छी तरह रक्षा करने वाले देवताओं के स्वामी, शक्र, वृत्रासुर को मारने वाले और सुषेण (सुन्दर सेनाओं से युत) तुमको मैं बुला रहा हूँ। हमारी वीर सेनायें संग्राम में विजयी हों।
इन्द्रध्वज को पिटकों से भूषित करने के समय, उठाने के समय, नगर में प्रवेश कराने के समय, स्नान कराने के समय, पुष्पमाला पहनाने के समय और विसर्जन के समय व्रती होकर राजा पूर्वोक्त मन्त्रों को पढ़े।
छत्र, पतका, दर्पण, फल अर्द्धचन्द्र, अनेक प्रकार की जलायें, केले का वक्ष, ईख और दिक्पालों (इन्द्र, यम, नैऋत, वरुण, वायु, कुबेर और महादेव) से युत-
अखण्डित आठ रस्सियों से बँधा हुआ, मजबूत लकड़ी का बना हुआ, दो मातृका वाला, दृढ़ बँधा हुआ, यन्त्रार्गल वाला और सारयुत वृक्षों से बनी हुई कुमारिकाओं से युत इन्द्र के लक्ष्म (ध्वज) को उठाये ।
मंगल आशीर्वाद और प्रणामों के द्वारा लगातार हुये मनुष्य के शब्दों से युत, ढोल, मृदङ्ग, राद्ध और मेरी के शब्दों से युत, वेदविहित वाक्यों को बार-बार पढ़ते हुये ब्राह्मणों से युत तथा मङ्गल शब्दों से युत ध्वज को राजा उठावे।
फल, दही, घी, लाजा ( लाई खील लावा), शहद और फूल हाथ में लिये, नत मस्तक वाले तथा मङ्गल शब्द बोलते हुये पुरवासियों के साथ प्रजाओं का स्वामी राजा अनिमिषों ( देवताओं) के भर्ता (स्वामी) इन्द्र के ध्वज को शत्रुवध के लिये शत्रु के नगर की तरफ झुकावे ।
अनतिशीघ्र, अविलम्ब, कम्पनरहित, अनष्ट माला और पिटक आदि भूषण वाले ध्वज का उठना शुभ है। इनसे भिन्न लक्षणयुत ध्वज का उठना अशुभ है। राजपुरोहित को शान्ति के द्वारा विघ्नों को दूर करना चाहिये ।
यदि इन्द्रध्वज पर मांस खाने वाला पक्षी, उल्लू, कबूतर, काक या उजली चिल्ह बैठे तो राजा को अत्यन्त भय, नीलकण्ठ बैठे तो युवराज को भय और बाज बैठे तो नेत्रभय करता है।
यदि ध्वज का छत्र भङ्ग हो जाय तो राजा की मृत्यु, उस पर मधुमक्खियाँ मुहाल (छत्ता) लगावें तो चोरों का उपद्रव, उल्का गिरे तो पुरोहित का नाश और वज्रपात हो तो राजा की प्रधान रानी का नाश होता है।
ध्वज यदि धुआँ से व्याप्त हो जाय तो अग्निभय, अन्धकार से व्याप्त हो जाय तो विकलता और वहाँ पर सर्प दब कर मर जायँ या गिरें तो मन्त्रियों का नाश होता है।
ध्वज के उत्तर दिशा में कोई उत्पात हो तो ब्राह्मणों को, पूर्व में क्षत्रियों को, दक्षिण में वैश्यों को और पश्चिम में कोई उत्पात हो तो शुद्रों को पीड़ित करेता है तथा यदि शक्र- कुमारी टूटे तो वेश्याओं का नाश होता है।
यदि इन्द्र-ध्वज उठाने के समय रस्सी कहीं से टूट जाय तो चालकों को और मातृका (तोरण का पार्श्ववर्ती काष्ठ) टूट जाय तो राजमाता को पीड़ा होती है।
अपनी बल-वृद्धि के लिये चार दिन (द्वादशी से पूर्णिमा तक) पूजित, खड़े हुये इन्द्र के ध्वज का मन्त्रियों के साथ होकर राजा पाँचवें दिन (प्रतिपदा के दिन) पूजन करके विसर्जन करे।
उपरिचर बसु द्वारा चलाई हुई और सदा राजाओं से की हुई इस विधि को करके राजा शत्रुकृत भय को नहीं प्राप्त कर पाता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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