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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 52
यथा त्वमूर्जस्करणैकरूपैः समर्चितस्त्वाभरणैरुदारैः । तथेह तान्याभरणानि यागे शुभानि सम्प्रीतमना गृहाण ॥
अनेक रूप वाले, श्रेष्ठ आभूषणों से पूजित हुये हैं, हे देव। उसी तरह इस यज्ञ में प्रसत्र मन होकर उन सब आभूषणों को ग्रहण करें।
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