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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 16
गौरासितक्षितिभवं सम्पूज्य यथाविधि द्विजः पूर्वम्। विजने समेत्य रात्री स्पृष्ट्वा ब्रूयादिमं मन्त्रम् ॥
श्वेत या काली भूमि में उत्पत्र (शुभ लक्षणयुत) वृक्ष के पास जाकर ब्राह्मण जन- रहित स्थान में रात्रि के समय विधिपूर्वक पूजन के बाद वृक्ष को स्पर्श करके वक्ष्यमाण मन्त्र बोले ।
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