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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 6
तं विष्णुतेजोद्भवमष्टचक्के रथे स्थितं भास्वति रत्नचित्रे । देदीप्यमानं शरदीव सूर्य ध्वजं समासाद्य मुमोद शक्रः ॥
विष्णु के तेज से उत्पन्न, आठ चक्रों से युत, प्रकाशित तथा मणियों से भूषित रथ पर स्थित और शारदीय सूर्य की तरह प्रकाशमान ध्वज पाकर इन्द्र बहुत प्रसन्न हुये ।
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