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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 40
षोडशभागाभ्यधिके जयविजये द्वे वसुन्धरे चान्ये । अधिका शक्रजनित्री मध्येऽष्टांशेन चैतासाम् ॥
धिक जय और विजय, जय और विजय से सोलहवाँ भाग अधिक दो वसुन्धरा तथा सबके बीच में वसुन्धरा से आठवाँ भाग अधिक शक्र जनित्री वनानी चाहिये।
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