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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 47
किञ्चिदद्य ऊर्ध्वनिर्मितमुपरि विशालं त्रयोदशं केतोः । शिरसि वृहस्पतिशुक्रौ लाक्षारससन्निभं ददतुः ॥
विश्वदेव ने कमल के समान उद्वंशसंज्ञक ग्यारहवाँ भूषण दिया। मुनियों ने नीलकमल के समान कान्ति बाला निवेश नामक वारहवाँ भूषण दिया। बृहस्पति और शुक्र ने कुछ नीचे-ऊपर बना हुआ,
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