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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 49
ध्वजपरिमाणत्र्यंशः परिधिः प्रथमस्य भवति पिटकस्य । परतः प्रथमात् प्रथमादष्टांशाष्टांशहीनानि ॥
ध्वजा के तृतीयांश प्रथम पिटक को परिधि, द्वितीय आदि वारह पिटक अपने से पूर्व पिटक से अष्टमांश कम करना चाहिये। जैसे- अष्टमांशोन-प्रथम-द्वितीय, अष्टमांशोन- द्वितीय-तृतीय, अष्टमांशोन-तृतीय-चतुर्थ, अष्टमांशोन-चतुर्थ-पञ्चम, अष्टमांशोन- पञ्चम-षष्ठ, अष्टमांशोन-षष्ठ-सप्तम, अष्टमांशोन- सप्तम-अष्टम, अष्टमांशोन-अष्टम- नवम, अष्टमांशोन-नवम-दशम, अष्टमांशोन-दशम-एकादश, अष्टमांशोन-एकादश- द्वादश और अष्टमांशोन- द्वादश-त्रयोदश पिटक बनाना चाहिये ।
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