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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 12
तस्य विधानं शुभकरणदिवसनक्षत्रमङ्गलमुहूर्तेः । प्रास्थानिकैर्वनमियाद् दैवज्ञः सूत्रधारश्च ॥
शुभ करण ( ९९ अध्याय के ४-५ श्लोक में उक्त), शुभ दिन, शुभ नक्षत्र, शुभ सकुन और शुभ मुहूर्त (यात्रा में उक्त मुर्त में ज्योतिषी और बढ़ई को वन में गमन करना चाहिये ।
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