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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 14
बहुविहगालयकोटरपवनानलपीडिताश्च ये तरवः । ये च स्युः स्त्रीसंज्ञा न ते शुभाः शक्रकेत्वर्थे ॥
वन्दाकवृक्ष से युत, बहुत पक्षियों के घोंसले वाले, बायु से टूटे हुये, आग से जले हुये और खीलिङ्ग नाम बाले (कदली, बदली आदि) वृक्षों के अतिरिक्त शुभ वृक्ष इन्द्रध्वज के लिये काटे गये।
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