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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 44
मञ्जिष्ठाभं वरुणः षडनि तत्पश्चमं जलोर्मिनिभम् । मायूरं केयूरं षष्ठं वायुर्जलदनीलम् ॥
वरुण ने मझीठ के समान कान्ति वाला, जलावतं कां तरह और छ: कोण वाला पाँचवाँ आभूषण दिया। वायु ने मयूर के पंख से व्याप्त और मेघ के समान नील वर्ण वाला छठा आभूषण केयूर दिया।
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