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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 66
दिनचतुष्टयमुत्थितमर्चितं समभिपूज्य नृपोऽहनि पश्चमे । प्रकृतिभिः सह लक्ष्म विसर्जयेद्बलभिदः स्वबलाभिविवृद्धये ॥
अपनी बल-वृद्धि के लिये चार दिन (द्वादशी से पूर्णिमा तक) पूजित, खड़े हुये इन्द्र के ध्वज का मन्त्रियों के साथ होकर राजा पाँचवें दिन (प्रतिपदा के दिन) पूजन करके विसर्जन करे।
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