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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 32
स्वाहावसानसमये स्वयमुज्ज्वलार्चिः स्निग्धः प्रदक्षिणशिखो हुतभुग् नृपस्य । गङ्गादिवाकर सुताजलचारुहारां धात्रीं समुद्ररशनां वशगां करोति ॥
यदि स्वाहा के अवसान (पूर्णाहुति देने के समय स्वयं प्रज्वलित शिखा वाली निर्मल और दक्षिणावर्त क्रम से चलती हुई शिखा वाली अग्नि हो तो गङ्गा और यमुना के जलरूपी सुन्दर हार बाली, समुद्ररूपी मेखला (तगड़ी) वाली पृथ्वी को राजा अपने वश में करता है, अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी का राजा होता है।
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