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बृहत्संहिता • अध्याय 43 • श्लोक 57
अच्छिन्नरज्जुं दृढकाष्ठमातृकं सुश्लिष्टयन्त्रार्गलपादतोरणम् । उत्थापयेल्लक्ष्म सहस्त्रचक्षुषः सारद्रुमाभग्नकुमारिकान्वितम् ॥
अखण्डित आठ रस्सियों से बँधा हुआ, मजबूत लकड़ी का बना हुआ, दो मातृका वाला, दृढ़ बँधा हुआ, यन्त्रार्गल वाला और सारयुत वृक्षों से बनी हुई कुमारिकाओं से युत इन्द्र के लक्ष्म (ध्वज) को उठाये ।
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